देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं
धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं
मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी
धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं
कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं
नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी
पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो
मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ
चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो
रचनाकार: सुभद्राकुमारी चौहान
June 20, 2008 at 5:34 am |
मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ
चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो
aaj is kavita ko baantne ke liye shukriya…..
June 20, 2008 at 5:40 am |
bahut sundar kavita hai,chahe bhaktan ka swikar kare ya nahi ye to wo hi jane.,sachhi shraddha usse raas aati hai.
June 20, 2008 at 6:11 am |
@Dr. anurag, thank you for commenting here!
@Mehek, aaj office mein kuch bhi kaam nahi hai so subah se baithkar sare poems padh rahi hun or bachpan ko yaad kar rahi hun. Shukriya mehek for writing here! Kya kahun in kavitaon ke bare mein…..mujhe lagta hai yeh hamsabki dil ki aawaz hai!
June 20, 2008 at 4:55 pm |
सुभद्रा कुमारी जी की रचना पढ़वाने के लिए बहुत आभार.
June 21, 2008 at 2:42 am |
@Sameersir,
Aapki bhi abhari hun aur mujhe achha laga aapne apna bahumulya time ise padhne mein lagaya! Shukriya…..
rgds.
November 23, 2008 at 10:11 pm |
Thank you very much for the lyrics of this poem. I had been searchig for the lyrics.