ले लो दो आने के चार
लड्डू राज गिरे के यार
यह हैं धरती जैसे गोल
ढुलक पड़ेंगे गोल मटोल
इनके मीठे स्वादों में ही
बन आता है इनका मोल
दामों का मत करो विचार
ले लो दो आने के चार।
लोगे खूब मज़ा लायेंगे
ना लोगे तो ललचायेंगे
मुन्नी, लल्लू, अरुण, अशोक
हँसी खुशी से सब खायेंगे
इनमें बाबू जी का प्यार
ले लो दो आने के चार।
कुछ देरी से आया हूँ मैं
माल बना कर लाया हूँ मैं
मौसी की नज़रें इन पर हैं
फूफा पूछ रहे क्या दर है
जल्द खरीदो लुटा बजार
ले लो दो आने के चार।
June 22, 2008 at 4:35 pm |
laddu bhut aache lage. acchi rachana ko padhane ke liye aabhar.
June 22, 2008 at 4:37 pm |
बहुत आभार इस प्रस्तुति का. लगता है स्कूल के समय की डायरी में बहुत पन्ने भरे हुए हैं..लाते रहिये, पढ़ाते रहिये.
June 22, 2008 at 4:58 pm |
वाह रेवा जी मजा आ गया लडडू बहुत अच्छे हमें भी खरीदवादो लडडू बनाते रहो और हमें खिलाते रहो
धन्यवाद और बधाई