क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बंटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन

6 Responses to “क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी”

  1. Manish Kumar Says:

    सुबह सुबह इतनी सुंदर कविता पढ़ाकर मन खुश कर दिया आपने। बिल्कुल दिल को छूती बात लिखी थी बच्चन जी ने.. बहुत बहुत आभार आपका

  2. Advocate Rashmi saurana Says:

    bhut ghari baat ki hai aapne apni kavita me. ati uttam. likhate rhe.

  3. Dr Anurag Says:

    pahle nahi padhi thi…aapka aabhar….

  4. Rewa Smriti Says:

    @Rashmiji, ye poem meri likhi hui nahi hai….Bachchanji ne likha hai. Main itna achha likh hi nahi sakti hun :)

    Aapko sabko dhanyawad yahan aane ke liye

  5. ritu bansal Says:

    सुन्दर कविता।

  6. Ashley Says:

    Are there no pems of girija kumar mathur .NIce poem
    by dr harivansh rai bacchan

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