लब पे आती है

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शम्मा की सुरत हो ख़ुदाया मेरी

दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा नो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सुरत या रब
इल्म की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्द-मंदों से ज़ैइफ़ों से मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

रचनाकार: इक़बाल

Note: This prayer I used to sing especially on every friday in my school Navodaya.

2 Responses to “लब पे आती है”

  1. Asha joglekar Says:

    Bahut sunder

  2. संगीता पुरी Says:

    क्या बात है। बहुत अच्छी कविता।
    जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाई।

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