इस एक बूँद आँसू में
चाहे साम्राज्य बहा दो
वरदानों की वर्षा से
यह सूनापन बिखरा दो
इच्छाओं की कम्पन से
सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्कराहट पर
मेरा नैराश्य लुटा दो ।
चाहे जर्जर तारों में
अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में
सुख का आसव छलका दो
मेरे बिखरे प्राणों में
सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में
अपना अस्तित्व मिटा दो !
पर शेष नहीं होगी यह
मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढा
तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !
लेखिका: महादेवी वर्मा
December 28, 2008 at 6:27 pm |
हाईस्कूल के समय से ही महादेवी वर्मा की रह्स्यवादी कविताओं का प्रशंसक रहा हूँ
December 29, 2008 at 6:55 am |
bahut achhi lagi rachana pehi baar padhi.
December 29, 2008 at 11:02 am |
महादेवी जी और उनकी कविता को सादर नमन…
नीरज
December 29, 2008 at 1:00 pm |
महादेवी जी की कविता पढ़ने के लिए मिली. आभार