उत्तर

इस एक बूँद आँसू में
चाहे साम्राज्य बहा दो
वरदानों की वर्षा से
यह सूनापन बिखरा दो

इच्छा‌ओं की कम्पन से
सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्कराहट पर
मेरा नैराश्य लुटा दो ।

चाहे जर्जर तारों में
अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में
सुख का आसव छलका दो

मेरे बिखरे प्राणों में
सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में
अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह
मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढा
तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !

लेखिका: महादेवी वर्मा

4 Responses to “उत्तर”

  1. विनय Says:

    हाईस्कूल के समय से ही महादेवी वर्मा की रह्स्यवादी कविताओं का प्रशंसक रहा हूँ

  2. mehek Says:

    bahut achhi lagi rachana pehi baar padhi.

  3. neeraj Says:

    महादेवी जी और उनकी कविता को सादर नमन…
    नीरज

  4. Ashish Kumar Anshu Says:

    महादेवी जी की कविता पढ़ने के लिए मिली. आभार

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