लब पे आती है

August 23, 2008

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शम्मा की सुरत हो ख़ुदाया मेरी

दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा नो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सुरत या रब
इल्म की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्द-मंदों से ज़ैइफ़ों से मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

रचनाकार: इक़बाल

Note: This prayer I used to sing especially on every friday in my school Navodaya.


यूँ तेरी रहगुज़र से दिवानावर गुज़रे

August 16, 2008

यूँ तेरी रहगुज़र से दिवानावर गुज़रे
काँधे पे अपने रख़ के अपना मजा़र गुज़रे

बैठे रहे हैं रास्ता में दिल का खानदार सजा़ कर
शायद इसी तरफ़ से एक दिन बहार गुज़रे

बहती हुई ये नदिया घुलते हुए किनारे
कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे

तू ने भी हम को देखा हमने भी तुझको देखा
तू दिल ही हार गुज़रा हम जान हार गुज़रे

रचनाकार: मीना कुमारी


यह न सोचो कल क्या हो

August 16, 2008

यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो

रोओ मत, न रोने दो
ऐसी भी जल-थल क्या हो

बहती नदी की बांधे बांध
चुल्लू मे हलचल क्या हो

हर छन हो जब आस बना
हर छन फ़िर निर्बल क्या हो

रात ही गर चुपचाप मिले
सुबह फ़िर चंचल क्या हो

आज ही आज की कहें-सुने
क्यो सोचे कल, कल क्या हो

रचनाकार: मीना कुमारी


सर फ़रोशी की तमन्ना

August 15, 2008

सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।

है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है।

हाथ जिन में हो जुनून कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है।

हम तो घर से निकले ही थे बांध कर सर पे क़फ़न
जान हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये क़दम
ज़िंदगी तो अपनी मेहमाँ मौत की महफ़िल में है।

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इंक़िलाब
होश दुशमन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाए जो हम से दम कहां मंज़िल में है।

यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।

*रचनाकार: राम प्रसाद बिस्मिल


गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है

July 9, 2008

गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।

(1).

इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही।
पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही।।
अंबर में सिर, पाताल चरण
मन इसका गंगा का बचपन
तन वरण-वरण मुख निरावरण
इसकी छाया में जो भी है, वह मस्‍तक नहीं झुकाता है।
ग‍िरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(2).

अरूणोदय की पहली लाली इसको ही चूम निखर जाती।
फिर संध्‍या की अंतिम लाली इस पर ही झूम बिखर जाती।।
इन शिखरों की माया ऐसी
जैसे प्रभात, संध्‍या वैसी
अमरों को फिर चिंता कैसी?
इस धरती का हर लाल खुशी से उदय-अस्‍त अपनाता है।
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(3).

हर संध्‍या को इसकी छाया सागर-सी लंबी होती है।
हर सुबह वही फिर गंगा की चादर-सी लंबी होती है।।
इसकी छाया में रंग गहरा
है देश हरा, प्रदेश हरा
हर मौसम है, संदेश भरा
इसका पद-तल छूने वाला वेदों की गाथा गाता है।
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(4).

जैसा यह अटल, अडिग-अविचल, वैसे ही हैं भारतवासी।
है अमर हिमालय धरती पर, तो भारतवासी अविनाशी।।
कोई क्‍या हमको ललकारे
हम कभी न हिंसा से हारे
दु:ख देकर हमको क्‍या मारे
गंगा का जल जो भी पी ले, वह दु:ख में भी मुसकाता है।
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(5).

टकराते हैं इससे बादल, तो खुद पानी हो जाते हैं।
तूफ़ान चले आते हैं, तो ठोकर खाकर सो जाते हैं।
जब-जब जनता को विपदा दी
तब-तब निकले लाखों गाँधी
तलवारों-सी टूटी आँधी
इसकी छाया में तूफ़ान, चिरागों से शरमाता है।
गिरिराज, हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।

रचनाकार: गोपाल सिंह नेपाली

Note: This I read in school days in ncert hindi text book.


कोशिश करने वालों की

July 7, 2008

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

 

रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन


क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी

July 2, 2008

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बंटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन


अग्नि पथ

July 2, 2008

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

वृक्ष हों भले खड़े,
हो घने, हो बड़े,
एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी!-कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
यह महान दृश्‍य है-

चल रहा मनुष्‍य है
अश्रु-श्‍वेद-रक्‍त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन


तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!

June 23, 2008

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!

तारक में छवि प्राणों में स्मृति
पलकों मे नीरव पद की गति
लघु उर पुलकों की संसृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या!

तेरा मुख सहास अरुणोदय
परछाई रजनी विषादमय
यह जागृति वह नींद स्वप्नमय;
खेल-खेल, थक-थक सोने दो
मै समझूँगी सृष्टि-प्रलय क्या!

तेरा अधर-विचुम्बित प्याला
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला;
फिर पूछूँ क्यों मेरे साकी!
देते हो मधुमय विषमय क्या!

रोम-रोम में नन्दन पुलकित;
साँस-साँस में जीवन शत-शत
स्वप्न-स्वप्न में विश्व अपरिचित-
मुझमें नित बनते-मिटते प्रिय!
स्वर्ग मुझे क्या, निष्क्रिय लय क्या!

हारूँ तो खोऊँ अपनापन,
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन,
जीत बनूँ तेरा ही बन्धन;
भर लाऊँ सीपी में सागर
प्रिय! मेरी अब हार-विजय क्या!

चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम,
मधुर राग तू मैं स्वरसंगम,
तू असीम मै सीमा का भ्रम,
काया-छाया में रहस्यमय!
प्रेयसि-प्रियतम का अभिनय क्या!


जाग तुझको दूर जाना!

June 23, 2008

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्‍यस्‍त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कंप हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्‍योम रो ले;

आज पी अलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाकर विद्युत-शिखाओ में निठूर तूफ़ान बोले!

पर तूझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्‍या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलयों के पर रंगीले?

विश्‍व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्‍या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?

तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया,
दे किसे जीवन सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?

सो गई आँधी मलय की वात का उपधान ले क्‍या?
विश्‍व का अभिशाप क्‍या चिर नींद बनकर पास आया?

अमरता-सुत चाहता क्‍यों मृत्‍यु के उर में बसना?
जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;

हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग को है अमर दीपक की निशानी!

है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

Note: This is one of my fav poem which I read in class 11th in NCERT hindi textbook..